छोटे भाई सिकंदर कबीरखान की कलम से...!
ये महज़ इत्तफ़ाक़ है कि हमारे दो त्यौहार पिछले बरसों और आने वाले बरसों में साथ साथ हैं।
*विजयदशमी दशहरा और मोहर्रम*
दोनों के पीछे एक पवित्र इतिहास है।
दशहरे में रावण का वध यानी असत्य पर सत्य की विजय तो मोहर्रम में सच्चाई (हक़ )की ख़ातिर भूखे और प्यासे रह कर जान गंवाना मंज़ूर किया मगर सत्य के आग्रह को नही छोड़ा।
दशहरा जहाँ विजय की खुशी में डूब कर मनाने वाला त्यौहार है वंही मोहर्रम ग़म मे डूबा हुआ, शहीदों को याद करने का मौक़ा है।
हज़रत मोहम्मद के नवासे और पूरा खानदान जिनमें छः माह के बच्चों समेत चालीस अफ़राद ने हक़ और सच्चाई की ख़ातिर अपनी (वलि) क़ुर्बानी दे कर इस्लाम के मूल्यों की रक्षा की मगर असत्य स्वीकार नहीं किया। दहशरे की विजय और मोहर्रम में शहादत के पीछे मक़सद एक और सिर्फ एक ही था *असत्य पर सत्य की विजय!*
ये मौके़ हमें गंगा जमुनी तहज़ीब में जीने और एक रहने का संदेश भी देते हैं।
तो आइये, हम अपने देश के दो अलग धाराओं मगर एक संदेश वाले इस अवसर को अपने अपने अन्दाज़ में मिल कर मनायें।
ये मज़ा सिर्फ और सिर्फ मेरे इस देश मे ही है दुनिया में और नहीं, कहीं नहीं
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