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कमाल की कला है कमालशाह के हाथों मे...!


जैतारण/पाली(आईबीखान)।
कमाल की कला है कमालशाह के हाथो मे...!शिर्षक पढकर आप चौक गये होगें,लेकिन यह सत्य है की जैतारण अजीम काँलोनी निवासी कमालशाह मुर्रहम पर निकाले जाने वाले ताजीया बनाने के कुशल कारीगरों मे एक है।अपने स्वर्गीय पिता लालशाह के साथ बचपन मे ताजीया बनाने के लिए उनका हाथ बटाते बटाते आज वे खुद ताजीया बनाने के कुशल कारीगर बनकर अपने पिता व्दारा सीखाये गये इस हुनर को विरासत के रूप मे अपने हाथों मे थाम रखा है।कमालशाह बताते है कि ताजीया बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी पडती है।उनके अनुसार ताजीया बनाने के लिए बास की खपचीया,सूतली,कागद-पेपर एवं बडी बलियो के अलावा चमकदार पेपर की आवश्यकता होती है।उन्होंने ने बताया की ताजीया को तीन भागों मे अलग अलग खण्ड मे तैयार किया जाता है,जिसमें रोजा, मेहराब एवं गुम्बद महत्वपूर्ण होते है।लगभग 25-26 वर्षों से वे जैतारण मे ताजीया बनाते आ रहे है।उनके हाथों बने ताजीयो को देखने से यह नहीं लगता की यह कागद या लकड़ीयो की बलियो से तैयार किया हुआ है,बल्कि उसको देखने वालों की नजरें उस पर ठहर जाती है।कमालशाह के हाथों की कारीगरी ताजीये को देखते ही बनती है।यह दिगर बात है कि आजकल महगाई के दौर मे अब ताजिए को स्टील की फर्मो मे बनाकर रखा हुआ है,जहां उसे भी तैयार करने मे कडी मेहनत लगती है।कमालशाह के अनुसार ताजिया बनाने का मेहनताना जहां ताजिया बनता है वहां के समाज के लोग देते है।वर्तमान मे कमालशाह जैतारण सिपायान बडाबास मे ताजिया बनाने मे जुटे हुए है,उनके इस कार्य मे मौहले के कुछ युवा भी हाथ बटा रहे है।उनके अनुसार अपने परिवार की इस कला को कमालशाह अपने इकलौते पुत्र वसीमशाह जो इन दिनों पढाई कर रहा है को भविष्य मे उसे भी यह कला सीखाना चाहते है।...9413063300

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