खरी-खोटी...कड़वी बात..!
आईबीखांन की कलम से
जैतारण राजकीय रैफरल चिकित्सालय मे गुरूवार को जो कुछ भी हुआ या किया गया उसे कदाचित उचित नही ठहराया जा सकता है।लोकतंत्र में विरोध प्रकट करने के अनेको तरीके है मगर विरोध एवं गुस्से मे आकर कानून को हाथ मे लेना इसे उचित नही माना जाना चाहिए।प्रदेशभर मे अपनी अहम पहचान रखने वाले जैतारण मे जो कुछ भी हुआ उसे कल से ही प्रदेशवासी सोशियल मीडिया,प्रिन्ट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया मे देखा और देखा जा रहा है।मगर बड़े दुर्भाग्य की बात तो यह रही की इस घटना के बाद जैतारण की राजनीति मे अपनी दखल रखने वाले सत्तापक्ष एवं विपक्षी नेताओ ने इस मामले में घटना के 24 घंटे बाद भी चुपी साधकर बैठना,इस अनाड़ी कलमकार के लिए चिन्ता का विषय बनने लगा है।अव्वल तो यह होना चाहिए था की इन नेताओ को अपने सार्वजनिक बयान जारी कर जनता को संयम और अपराधियो की गिरफ्तारी करवाने के बयान जारी करने थे।तो विपक्षी नेताओं को सरकारी चिकित्सालय की लचर व्यवस्था एवं सरकार के नुमाइंदो के खिलाफ बोलना था मगर उन्होने भी एक शब्द नही बोला,हो सकता है उनका वोट बैक का गणित बिगड़़ जाता...!मुझे इस बात का भी मलाल है कि इस घटना को जिसने भी अंजाम दिया वे कानून की श्रैणी मे अपराधी होगे,मगर जिन्होने अपराध किया ही नही वे इस मामले मे अपराधी क्यो समझे जा रहे है।इस प्रकरण के बाद मैने जो एक अनाड़ी कलमकार के रूप मे जो अनुभव किया,उससे तो यही जाहिर हुआ की इस मामले को सम्प्रदायिक रूप देने का प्रयास किया गया।जबकि ऐसा हुआ ही नही जिसे यह रूप दिया जाय।यदि ऐसा होता तो आज जैतारण बंद का सर्वसमाज के लोग इस बंद का समर्थन नही करते,इस मामले मे मेरा मानना है कि पुलिस प्रशासन ने भी घटना की सूचना मिलने के बाद शायद उस समय गंभीरता दिखाई होती तो शायद यह मामला इतना नही बढता मगर वे भी समय पर नही पहुंच पाये।इस प्रकरण के बाद आमजन की सहानुभूति पूरे चिकित्साकर्मीयो के साथ है और ऐसे मामलो मे रहनी भी चाहिए,मगर यह भी नही भुलना चाहिए की जैतारण राजकीय चिकित्सालय की वास्तविक व्ववस्थाएं कैसी है,यह बात भी अब इस प्ररकरण के बाद गौण हो गई है,अलबता आमतौर पर यहां मरीज एवं उनके परिजन परेशान ही होते आये है,लेकिन अब स्थिति इसके विपरित बन गई है...!
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