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सुविधाओं को तरस रहा है मँत्रीजी के गांव का चिकित्सालय

जैतारण-आईबीखान
Jaitaran:i.b.khan                                     जैतारण तहसील जिला पाली राजस्थान के ऐतिहासिक धरोहर रहष्यमय धार्मिक स्थलों में  एक  कृषि प्रधान गाँव पाटवा विकास की बुनियादी सुविधाओं से तरसता रहा हैं आये दिन  अखबारों एव न्यूजः मीडिया में सुर्खियो में रहता है लेकिन फिर भी आजतक क़ोई समस्याओं का स्थाई  निदान नही हुआ।   राज्यस्तर पर कायाकल्प कार्यक्रम के तहत आयोजित कार्यक्रम में जनस्वाथ्य से ज़ुड़े सभी हॉस्पिटल तथा आर्दश  गाँव , पंचायत ,गाँव से जुड़े कृषि क्षेत्र में ढाणियां के विकासः की मुहिम शुरू हुये कई वर्ष बीत जाने के बाद भी गांव  पाटवा की हालत दयनीय स्थिति को देखते हुए  न तो गाँव के युवाओँ में जज्बा हे और न ही बुद्धिजीवी महानुभवो में, शायद ये गांव अपनों का ही जख्म् झेलकर पिछड़ेपन का नासुर झेल रहा हैं।                       मार्च 1991  में    6  बेड स्तर का  राजकीय प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पाटवा हॉस्पिटल  की नींव गाँव के बुद्धिजीवी जनहितैषी महानुभवो की दूरदर्शी सोंच के बदौलत श्रीमान सुरेंद्र गोयल एवँ समाजसेवी पांचू लाल पूर्व पटवारी  जी तथा  उनकी टीम द्वारा निर्धारित समय में पाटवा पंचायत के सरपंच श्री अशोक भंडारी के कार्यकाल तथा हॉस्पिटल प्रभारी अधिकारी डॉ चंदननारायण छिपा   के  सांनिध्य में  30-03-1991 में जनहित में इस्  हॉस्पिटल का माननीय जैतारण विधायक सुरेंद्र गोयल की अध्यक्षता के कर कमलो के द्वारा शिलान्यासः कर पाटवा गांव को खुशियो की  शौगात के रूप में अनमोल तोहफा दिया। ऐसा लगने लगा की शायद गांव के विकासः उड़ान के पँख लग गये हो ।            धीरे धीरे समय निकलता गया पर हॉस्पिटल में कभी डॉक्टर, कभी सहायक स्टाफ की कमी से ग्रमीणों को न तो हॉस्पिटल होने का स्वास्थ्य एव जनकल्याण योजनाओं का फायदा हुवा और न ही हॉस्पिटल का विकास के साथ क्रमोंनित होकर आर्दश हॉस्पिटल बना। हालात वैसे के वैसे रहे और आज भी अति आवश्यक एंबुलेन्स भी इस्  हॉस्पिटल में नही होने से मरीजो को अपने निजी वाहनों के माध्यम से महंगे किराये वहन कर विपरीत परिस्थितियों से झुंझकर दूरदराज़ अन्य हॉस्पिटलों में में रुख करना पड़ता हैं। इस् गांव का दुर्भाग्य है कि न तो आवागमन के सरकारी साधन उपलब्ध हैं न ही रोड़वेज का आवागमन ,शायद ऐसे में इस् गाँव की तरफ कोई आना भी पसन्द नही करता यही वजह है कि कोई सरकारी कर्मचारी  भी इस् गांव में सरकारी एव गैर सरकारी नौकरी  नही करना चाहते। हॉस्पिटल में डॉक्टर , नर्सिंग स्टाफ, अन्य कर्मचारियों के लिए आवासिय सुविधाएं मुहैया  नही होने से कोई भी डॉक्टर इस् हॉस्पिटल में स्रेविस  करना नही  चाहते । सरकारी  हॉस्पिटल में न तो तकनीकि उच्च स्तर के उपकरण हे और न ही स्वास्थ्य सम्बंधी तकनीकी मशीनें और ना ही पूर्ण सुविधायक्त लेबेटरी,ऐसे में मरीजो का ईलाज करना संभव नही।दूसरे पक्ष से देखा जाएं शायद उनके जहाँन में अपने बच्चों एव परिवार को लेकर उच्च शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, अन्य संसाधनों आवागमन सुविधाओ,मननोरंजन, के  बुनियादि सुविधाओं से वंचित होने के कारण गांव को अतिपिछड़ा , एकान्त एव अलग-थलग  की छवि की  होने से गांव की छवि भी धूमिल हुई।जिससे उनका  गांव पाटवा से मोहः भांग होने लगा।  अगर ऐसे हालात रहे तो  आज युवा गांव को आर्दश गांव एव  हाई टेक स्मार्ट सिटी बनाने का सपना शायद सपना ही रह जायेगा।...साभार प्रकाश सोलंकी 'आजाद'पाटवा।.

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